उत्तराखंड के पलायन का पूरा सच
दस साल में प्रदेश के 3.83 लाख से अधिक लोगों ने किया अस्थायी पलायन
अमर हिंदुस्तान ब्यूरो
देहरादून। पृथक राज्य बनने के ढाई दशक बाद भी विकास पहाड़ नहीं चढ़ पाया। पहाड़ में बीमारों को अस्पताल पहुंचाने के लिए आज भी डंडी कंडी, पालकी का सहारा लेना पड़ रहा है। वन्य जीवों के साथ मानव संघर्ष निरंतर बढ़ता जा रहा है और निरंतर हिंसक हो रहे वन्य जीव सैकड़ों लोगों की बलि हाल के वर्षों में ले चुके हैं।
कुछ साल पहले बाबा केदार की धरती से जब प्रधानमंत्री ने भरोसा दिलाया कि इस सदी का तीसरा दशक उत्तराखंड का होगा तो एक उम्मीद बंधी थी कि शायद सब कुछ ठीक हो जाएगा। जो अब तक नहीं हुआ, वह अब हो जाएगा और दूसरे शब्दों के कहें तो अच्छे दिन आने का सपना देखा गया लेकिन तीसरा दशक जैसे जैसे बीत रहा है, उम्मीदों पर भी पानी फिरता जा रहा है।
उत्तराखंड में पलायन की समस्या कितनी गहरी है, इसका एक बड़ा दस्तावेजी खुलासा ग्राम्य विकास एवं पलायन निवारण आयोग से प्राप्त सूचना से हुआ है। हल्द्वानी के समाजसेवी और आरटीआई एक्टिविस्ट हेमंत सिंह गौनिया को सूचना अधिकार के तहत मिली जानकारी चौंकाने वाली है।
ऐसा भी नहीं है कि इस दौरान कोई विकास नहीं हुआ। हजारों करोड़ रुपए हर साल विकास की मद में खर्च हो रहे हैं। लेकिन सर्वांगीण विकास और लोगों के पहाड़ में ठहराव का सपना आज भी पूरा होना शेष है। बंजर होते खेतों की संख्या लगातार बढ़ रही है लेकिन इस समस्या को अभी तक इंडोर्स नहीं किया जा सका है।
बहरहाल पलायन आयोग ने सूचना हेमंत सिंह गौनिया को जो सूचना उपलब्ध कराई है, वह निराशा के भंवर में धकेलती है।
आयोग की रिपोर्ट में उल्लेख किया गया है कि वर्ष 2011 से 2018 तक प्रदेश के 3,83,726 लोगों ने अस्थायी पलायन किया। आयोग के आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2011 से 2018 के बीच उत्तराखंड की ग्राम पंचायतों से कुल 3,83,726 लोगों ने अस्थायी पलायन किया। इसका अर्थ ऐसे पलायन से है जिसमें लोग रोजगार आदि के लिए बाहर रहते हैं, लेकिन गांव से उनका संपर्क बना रहता है।
इस अवधि में सबसे अधिक अस्थायी पलायन टिहरी गढ़वाल से 71,509, अल्मोड़ा से 53,611, पौड़ी से 47,488, पिथौरागढ़ से 31,786 और चमोली से 32,020 लोगों का दर्ज किया गया। इसके बाद वर्ष 2018 से 2022 के बीच भी 3,07,310 लोग गांव से बाहर गए। वर्ष 2018 से 2022 के बीच कुल 3,07,310 लोगों के अस्थायी पलायन का आंकड़ा सामने आया है। आयोग की रिपोर्ट के अनुसार इस अवधि में अल्मोड़ा में 54,519, टिहरी में 41,359, पौड़ी में 29,093, हरिद्वार में 28,087, पिथौरागढ़ में 25,715 और नैनीताल में 20,863 लोगों का अस्थायी पलायन दर्ज किया गया। अर्थात पहली रिपोर्ट की तुलना में अस्थायी पलायन की कुल संख्या में कमी दिखाई देती है। सरकारी रिपोर्ट में भी दोनों अवधियों के तुलनात्मक अध्ययन में गिरावट दर्ज की गई है।
स्थायी पलायन की स्थिति चिंताजनक
तस्वीर का दूसरा पहलू यह या कि वर्ष 2011 से 2018 के बीच 1,18,981 लोग स्थायी रूप से पलायन कर गए थे। वहीं वर्ष 2018 से 2022 के बीच स्थायी पलायन करने वालों की संख्या 28,531 रही। 2018–22 में सबसे अधिक स्थायी पलायन अल्मोड़ा में 5,926, टिहरी गढ़वाल में 5,653, पौड़ी गढ़वाल में 5,474, नैनीताल में 2,014, चमोली में 1,722 और पिथौरागढ़ में 1,713 लोगों का हुआ।
प्रदेश की दो हजार से अधिक ग्राम पंचायतों से स्थाई पलायन
आयोग की रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2018 से 2022 के बीच प्रदेश के 77 विकासखंडों की 2,067 ग्राम पंचायतों में स्थायी पलायन दर्ज हुआ। कुल 28,531 लोग जिला मुख्यालय, नजदीकी कस्बों, दूसरे जिलों, राज्य से बाहर अथवा देश से बाहर चले गए।
पहाड़ के 24 और गांव घोस्ट विलेज बने
श्री गौनिया को आरटीआई में मिले दस्तावेज के अनुसार वर्ष 2018 के बाद प्रदेश के 24 ग्राम/तोक/मजरे पूरी तरह निर्जन यानी आबादी रहित हो गए। इन स्थानों पर स्थायी पलायन के कारण आबादी समाप्त होने की स्थिति सामने आई है। यहां घरों पर ताले लटक गए हैं।
यह आंकड़ा उत्तराखंड के पहाड़ी गांवों के सामने खड़ी गंभीर चुनौती को दर्शाता है।
पलायन पहाड़ के साथ मैदान से भी हुआ
आंकड़ों में मैदानी जिलों की तस्वीर भी सामने आती है। हरिद्वार से वर्ष 2018–22 में 28,087 तथा ऊधमसिंह नगर से 19,583 लोगों के अस्थायी पलायन का आंकड़ा सामने आया है। यानी पलायन अब केवल पर्वतीय जिलों तक सीमित समस्या नहीं रह गया है। रोजगार, शिक्षा और बेहतर अवसरों की तलाश में मैदानी क्षेत्रों से भी लोगों का अस्थायी पलायन हो रहा है। स्थायी पलायन करने वालों के बारे में उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार 35.47 प्रतिशत लोग नजदीकी कस्बों में, 17.86 प्रतिशत जिला मुख्यालयों में, 23.61 प्रतिशत राज्य के अन्य जिलों में, 21.80 प्रतिशत राज्य से बाहर और 1.26 प्रतिशत देश से बाहर गए। इससे साफ है कि बड़ी संख्या में ग्रामीण आबादी गांव छोड़कर पहले आसपास के कस्बों और शहरों की ओर जा रही है। पलायन आयोग ने सरकार को अनेक रिपोर्ट और सिफारिशें दी हैं, लेकिन अब यह देखना जरूरी है कि इन सिफारिशों में से कितनी जमीन पर लागू हुईं और कितने गांवों में वास्तव में बदलाव आया। सरकारी आंकड़ों की यह तस्वीर बताती है कि उत्तराखंड में पलायन की रफ्तार कुछ श्रेणियों में कम जरूर हुई है, लेकिन गांवों की आबादी बचाने और स्थाई पलायन रोकने की चुनौती अभी भी बड़ी है। निष्कर्ष यह कि फिलवक्त इस शताब्दी का तीसरा दशक उत्तराखंड का होता नहीं दिख रहा है। यद्यपि सरकार के स्तर पर जो चमकदार तस्वीर पेश की जा रही है, धरातल पर धुंधली क्यों दिख रही, यह चिंता का विषय है। अभी हाल में 24 नए गांव घोस्ट विलेज बन गए तो भाग्य विधाताओं से सोचने की सहज अपेक्षा तो की ही जानी चाहिए।

