उत्तराखंड

विकास या विनाश? उत्तराखंड की हरियाली पर बढ़ता बुलडोजर

 

अमर हिन्दुस्तान
देहरादून।उत्तराखंड अपनी प्राकृतिक सुंदरता, घने जंगलों, स्वच्छ नदियों और शांत पर्वतीय वातावरण के लिए देश-दुनिया में पहचान रखता है। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में जिस तेजी से विकास परियोजनाओं को अमलीजामा पहनाया जा रहा है, उसने पर्यावरण और पारिस्थितिकी को लेकर गंभीर चिंताएं खड़ी कर दी हैं।राज्य में रिंग रोड, एलिवेटेड रोड, चौड़ीकरण, फोरलेन और सौंदर्यीकरण जैसी योजनाओं के लिए बड़े पैमाने पर पेड़ों की कटाई हो रही है, जिसे लेकर सामाजिक संगठनों, पर्यावरणविदों और स्थानीय नागरिकों का विरोध लगातार मुखर होता जा रहा है।देहरादून में हाल ही में राजपुर रोड पर राष्ट्रपति भवन परिसर के आसपास बड़ी संख्या में पेड़ों की कटाई की गई। इसके अलावा सहस्त्रधारा रोड के चौड़ीकरण के दौरान भी हजारों पेड़ों के हटने का दावा किया जा रहा है। पर्यावरण संरक्षण से जुड़े लोगों का कहना है कि दशकों पुराने वृक्षों को काटने का असर केवल हरियाली तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि इससे दून घाटी का तापमान, भूजल स्तर, जैव विविधता और वायु गुणवत्ता भी प्रभावित होगी।खलंगा क्षेत्र में प्रस्तावित सड़क परियोजना के लिए लगभग चार हजार पेड़ों की कटाई का मामला भी लंबे समय तक चर्चा में रहा।

सामजिक कार्यकर्ता रोशन राणा का कहना है कि स्थानीय लोगों, सामाजिक संस्थाओं और पर्यावरण प्रेमियों के लगातार विरोध और जनजागरण अभियान के बाद फिलहाल इस क्षेत्र में पेड़ों पर आरी चलने से रोक लग सकी। इसे पर्यावरण संरक्षण की दिशा में एक बड़ी सफलता माना गया, लेकिन लोगों का कहना है कि खतरा अभी टला नहीं है।अब भानियावाला–ऋषिकेश मार्ग के सौंदर्यीकरण और चौड़ीकरण की योजना को लेकर भी नई बहस शुरू हो गई है। सात मोड़ क्षेत्र अपनी प्राकृतिक सुंदरता, हरियाली और पर्यटन महत्व के लिए जाना जाता है।
स्थानीय नागरिकों का कहना है कि यदि यहां भी बड़े पैमाने पर पेड़ों की कटाई हुई तो क्षेत्र की प्राकृतिक पहचान को गहरा नुकसान पहुंचेगा।पर्यावरणविद सवाल उठा रहे हैं कि क्या विकास का मतलब केवल नई सड़कें और चौड़ीकरण है? उनका कहना है कि यदि शहर के भीतर की समस्याओं पर ध्यान दिया जाए तो आज भी देहरादून जलभराव, टूटी सड़कों, अव्यवस्थित यातायात और खराब ड्रेनेज व्यवस्था जैसी बुनियादी समस्याओं से जूझ रहा है। बारिश के दौरान कई प्रमुख सड़कें तालाब का रूप ले लेती हैं और आम लोगों को भारी परेशानी उठानी पड़ती है।
सामजिक कार्यकर्ता रोशन राणा का कहना है कि रिस्पना और बिंदल जैसी नदियों की हालत भी लगातार बिगड़ती जा रही है। दोनों नदियां कई स्थानों पर कूड़े, मलबे और अतिक्रमण की चपेट में हैं। बरसात के समय यही स्थिति जल निकासी में बाधा बनती है और कई रिहायशी क्षेत्रों में जलभराव की समस्या गंभीर रूप ले लेती है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि नदियों के संरक्षण और पुनर्जीवन पर गंभीरता से काम किया जाए तो शहर की कई समस्याओं का समाधान संभव है।दिल्ली–देहरादून एक्सप्रेसवे और अन्य निर्माण परियोजनाओं को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। कई स्थानों पर भूस्खलन, सड़क धंसने और पहाड़ियों के अस्थिर होने की घटनाएं सामने आई हैं।
रोशन राणा लोगों का कहना है कि विकास कार्यों में पर्यावरणीय मानकों का पूरी तरह पालन किया जाना चाहिए, ताकि भविष्य में किसी बड़े हादसे की आशंका न रहे। सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि उत्तराखंड की पहचान उसके जंगल, पहाड़, नदियां और जैव विविधता हैं। यदि इन्हीं प्राकृतिक संसाधनों का लगातार दोहन होता रहा तो आने वाली पीढ़ियों को इसकी भारी कीमत चुकानी पड़ेगी। उनका मानना है कि विकास आवश्यक है, लेकिन वह प्रकृति के साथ संतुलन बनाकर किया जाना चाहिए, न कि उसकी कीमत पर।
उन्होंने कहा कि उत्तराखंड के नागरिक अब यह सवाल पूछ रहे हैं कि क्या विकास और पर्यावरण संरक्षण साथ-साथ नहीं चल सकते? क्या आधुनिक आधारभूत सुविधाओं के साथ राज्य की प्राकृतिक धरोहर को बचाने के लिए वैकल्पिक और टिकाऊ मॉडल नहीं अपनाए जा सकते? यह बहस अब केवल पेड़ों की कटाई तक सीमित नहीं रही, बल्कि राज्य के भविष्य और उसकी पर्यावरणीय पहचान से जुड़ा एक बड़ा मुद्दा बन चुकी है।

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