उत्तराखंड

दान पर नहीं, विश्वास पर टिकी है मंदिरों की गरिमा

सुभाष चंद्र जोशी

अयोध्या के श्रीराम मंदिर में चढ़ावे की चोरी का मामला अभी पूरी तरह शांत भी नहीं हुआ था कि उत्तराखंड के बदरीनाथ धाम में दानचढ़ावे में कथितहेराफेरी के आरोपों ने नई चिंता खड़ी कर दी। दोनों घटनाएं अलगअलग हैं, लेकिन एक समान संदेश देती हैंधार्मिक संस्थानों में पारदर्शिता औरजवाबदेही पहले से अधिक मजबूत करने की आवश्यकता है।

यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि बदरीनाथ धाम में अभी केवल आरोप सामने आए हैं। श्री बदरीनाथकेदारनाथ मंदिर समिति ने मामले की जांच शुरूकर दी है और किसी भी व्यक्ति की संलिप्तता अभी सिद्ध नहीं हुई है। इसलिए जांच पूरी होने से पहले किसी को दोषी ठहराना उचित नहीं होगा।लेकिन आरोप भी इतने गंभीर हैं कि उन्हें हल्के में नहीं लिया जा सकता।

मंदिरों में चढ़ाया जाने वाला दान केवल धन नहीं होता, बल्कि श्रद्धालुओं का विश्वास होता है। कोई व्यक्ति अपनी मेहनत की कमाई भगवान केचरणों में इस भरोसे के साथ अर्पित करता है कि उसका सदुपयोग होगा। यदि इस विश्वास पर संदेह पैदा होता है तो सबसे बड़ी क्षति आस्था की होतीहै।

देवभूमि उत्तराखंड की पहचान उसके पवित्र धाम हैं। बदरीनाथ और केदारनाथ जैसे तीर्थ केवल उत्तराखंड की नहीं, बल्कि पूरे देश की आध्यात्मिकधरोहर हैं। इसलिए यहां की व्यवस्थाओं पर उठने वाला हर प्रश्न राष्ट्रीय महत्व का विषय बन जाता है। ऐसी स्थिति में मंदिर प्रबंधन की जिम्मेदारी औरभी बढ़ जाती है।

समय की मांग है कि दान व्यवस्था पूरी तरह पारदर्शी बनाई जाए। आधुनिक तकनीक, सीसीटीवी निगरानी, नियमित ऑडिट, डिजिटल रिकॉर्ड औरसार्वजनिक जवाबदेही जैसी व्यवस्थाएं अब विकल्प नहीं, बल्कि आवश्यकता हैं। जितनी पारदर्शिता होगी, उतना ही श्रद्धालुओं का विश्वास मजबूतहोगा।

यदि जांच में कोई दोषी पाया जाता है तो उसके खिलाफ कठोर कार्रवाई होनी चाहिए। वहीं यदि आरोप निराधार साबित होते हैं तो यह तथ्य भी पूरीस्पष्टता के साथ जनता के सामने रखा जाना चाहिए। पारदर्शिता का अर्थ केवल दोषियों को पकड़ना नहीं, बल्कि निर्दोषों पर लगे संदेह को भी दूरकरना है।

उत्तराखंड की धार्मिक पहचान उसकी सबसे बड़ी पूंजी है। इसे सुरक्षित रखने की जिम्मेदारी सरकार, मंदिर समिति, प्रशासन और समाज सभी की है।आस्था तब तक सुरक्षित रहेगी, जब तक व्यवस्था निष्पक्ष, ईमानदार और पारदर्शी रहेगी। यही देवभूमि की गरिमा है और यही करोड़ों श्रद्धालुओं कीअपेक्षा भी।

मंदिरों की वास्तविक शक्ति उनकी संपत्ति नहीं बल्कि श्रद्धालुओं का विश्वास है। यदि यही विश्वास कमजोर पड़ने लगे तो इसका असर केवल किसीएक संस्था तक सीमित नहीं रहता, बल्कि पूरे धार्मिक तंत्र पर पड़ता है।

दान देने वाला श्रद्धालु यह विश्वास लेकर आता है कि उसकी अर्पित राशि धर्म, सेवा, गौसेवा, अन्नक्षेत्र, मंदिर संरक्षण और जनकल्याण में उपयोगहोगी। यदि इस विश्वास पर आंच आती है तो समाज में निराशा और अविश्वास बढ़ सकता है।

धार्मिक संस्थानों से जुड़े मामलों को राजनीतिक चश्मे से देखने के बजाय उन्हें प्रशासनिक पारदर्शिता और कानूनी प्रक्रिया के आधार पर देखा जानाचाहिए। यदि कोई दोषी है तो उसके विरुद्ध कठोर कार्रवाई होनी चाहिए, लेकिन जब तक जांच पूरी हो जाए तब तक किसी को दोषी मान लेना भीन्यायसंगत नहीं होगा।

उत्तराखंड सरकार और श्री बदरीनाथकेदारनाथ मंदिर समिति के सामने यह एक अवसर भी है कि वे ऐसी व्यवस्था विकसित करें जिसे पूरे देश केमंदिर प्रबंधन के लिए आदर्श मॉडल के रूप में प्रस्तुत किया जा सके। यदि तकनीक, पारदर्शिता और सामाजिक भागीदारी को प्राथमिकता दी जाए तोभविष्य में ऐसे विवादों की संभावना काफी हद तक समाप्त की जा सकती है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *