उत्तराखंड

हर मानसून में क्यों टूटता उत्तराखंड?

 

सुभाष चंद्र जोशी
उत्तराखंड में मानसून केवल वर्षा का मौसम नहीं है, बल्कि राहत और संकट दोनों का साथ लेकर आता है। पहाड़ों में होने वाली बारिश जहां प्राकृतिक जलस्रोतों, जंगलों और कृषि को नया जीवन देती है, वहीं भूस्खलन, बादल फटना, नदी-नालों का उफान और सड़क मार्गों का बार-बार अवरुद्ध होना हजारों लोगों के जीवन को प्रभावित कर देता है। वर्ष 2026 का मानसून भी इस कटु सच्चाई को एक बार फिर सामने लेकर आया है कि हिमालयी राज्य में आपदा केवल प्राकृतिक नहीं, बल्कि अवसंरचना, वैज्ञानिक योजना और विकास मॉडल की भी चुनौती है।मानसून के सक्रिय होते ही प्रदेश के अनेक हिस्सों में सड़क संपर्क प्रभावित हो गया है। राज्य आपातकालीन परिचालन केंद्र (SEOC) के अनुसार प्रदेश में चार राज्यमार्ग सहित कुल 70 सड़कें बंद हैं। सबसे अधिक देहरादून और पिथौरागढ़ में 14-14 सड़कें अवरुद्ध हैं, जबकि देहरादून में तीन प्रमुख राज्यमार्ग भी बंद पड़े हैं। इसके अलावा चमोली में 10, पौड़ी और टिहरी में 8-8, बागेश्वर में 6, रुद्रप्रयाग में 4 तथा चंपावत, अल्मोड़ा और नैनीताल में 2-2 सड़कें बाधित हैं। ये केवल आंकड़े नहीं हैं, बल्कि उन हजारों परिवारों की पीड़ा का दस्तावेज हैं जिनका दैनिक जीवन इन मार्गों पर निर्भर करता है।इसी बीच टिहरी जनपद के कद्दूखाल स्थित सुरकंडा देवी मार्ग पर भारी वर्षा के कारण भवन ढहने की घटना ने लोगों को झकझोर दिया। यह दृश्य केवल प्राकृतिक आपदा का नहीं, बल्कि यह संकेत भी है कि पर्वतीय क्षेत्रों में लगातार बढ़ते जलवायु जोखिम और कमजोर अवसंरचना किस प्रकार जन-धन की सुरक्षा को चुनौती दे रहे हैं।उत्तरकाशी के मोरी विकासखंड की बड़ासु पट्टी इसका एक और जीवंत उदाहरण है।

 

सांकरी-गंगाड़-ओसला मोटर मार्ग पर हलारा और पूर्ति नालों में जलस्तर बढ़ने से पवाणी, ओसला, गंगाड़, ढाटमीर और तालुका जैसे गांवों का संपर्क जोखिम भरा हो गया है। ग्रामीण जान जोखिम में डालकर उफनते नालों को पार कर रहे हैं। दोपहिया वाहन निकालने के लिए कई लोगों की सहायता लेनी पड़ रही है, जबकि पैदल यात्रियों के सामने हर पल दुर्घटना का खतरा बना हुआ है। यह केवल एक क्षेत्र की समस्या नहीं, बल्कि पूरे पर्वतीय उत्तराखंड की वास्तविक तस्वीर सड़कें बंद होने से किसानों की उपज समय पर बाजार तक नहीं पहुंच पाती और महीनों की मेहनत देखते ही देखते नुकसान में बदल जाती है। दूसरी ओर पर्यटन उद्योग और चारधाम यात्रा भी प्रभावित होती है, जिससे राज्य की अर्थव्यवस्था पर व्यापक असर पड़ता है।हर वर्ष आपदा के बाद राहत, मलबा हटाने और अस्थायी मरम्मत का सिलसिला शुरू हो जाता है। करोड़ों रुपये खर्च होते हैं, लेकिन जिन स्थानों पर हर वर्ष भूस्खलन होता है या नाले उफान पर आते हैं, वहां स्थायी समाधान आज भी अधूरा है। जहां मजबूत पुल बनने चाहिए, वहां अस्थायी व्यवस्थाएं हैं।

 

जहां वैज्ञानिक ड्रेनेज प्रणाली होनी चाहिए, वहां वर्षा का पानी सड़क को ही अपना रास्ता बना लेता है। परिणामस्वरूप अगले मानसून में वही सड़क फिर टूट जाती है और वही संकट फिर सामने खड़ा हो जाता है। यह चक्र वर्षों से जारी है, लेकिन स्थायी समाधान की दिशा में अपेक्षित गति दिखाई नहीं देती।सड़क निर्माण और विकास परियोजनाओं में भू-वैज्ञानिक अध्ययन को सर्वोच्च प्राथमिकता देना अब विकल्प नहीं, बल्कि अनिवार्यता बन चुका है। बिना वैज्ञानिक आकलन के किए गए पहाड़ों के कटान, अनियंत्रित निर्माण, नदी-नालों के प्राकृतिक प्रवाह में हस्तक्षेप तथा जल निकासी की उपेक्षा अनेक स्थानों पर भूस्खलन की घटनाओं को और गंभीर बना रही है। जलवायु परिवर्तन के कारण अत्यधिक वर्षा, क्लाउडबर्स्ट और अचानक आने वाली बाढ़ की घटनाएं बढ़ रही हैं। ऐसे में दशकों पुरानी सोच और पारंपरिक निर्माण पद्धतियों से आगे बढ़कर जलवायु अनुकूल, वैज्ञानिक और टिकाऊ विकास मॉडल अपनाना समय की मांग है।

राज्य सरकार ने जिलों को अलर्ट पर रखा है, आपदा प्रबंधन तंत्र को सक्रिय किया है तथा बंद सड़कों को शीघ्र खोलने के निर्देश दिए हैं। राहत एवं बचाव दल लगातार कार्य कर रहे हैं। यह निश्चित रूप से सराहनीय है, लेकिन केवल तात्कालिक राहत पर्याप्त नहीं होगी। आवश्यकता इस बात की है कि बार-बार मरम्मत पर धन खर्च करने के बजाय स्थायी पुल, उच्च क्षमता वाले कल्वर्ट, सुरक्षित ढलान, आधुनिक ड्रेनेज व्यवस्था, रिटेनिंग वॉल, वैकल्पिक संपर्क मार्ग, ढलान स्थिरीकरण तकनीक और अत्याधुनिक पूर्व चेतावनी प्रणाली विकसित की जाए।
साथ ही स्थानीय समुदायों, ग्राम समितियों और स्वयंसेवी संस्थाओं को आपदा प्रबंधन का सक्रिय भागीदार बनाया जाए, क्योंकि किसी भी आपदा में सबसे पहले स्थानीय लोग ही राहत और बचाव का कार्य करते हैं।

उत्तराखंड जैसे संवेदनशील हिमालयी राज्य में विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन स्थापित करना समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है। सड़कें, सुरंगें, पुल और अन्य विकास परियोजनाएं आवश्यक हैं, लेकिन उनका निर्माण हिमालय की भौगोलिक संवेदनशीलता और पर्यावरणीय क्षमता को ध्यान में रखकर ही होना चाहिए। प्रकृति के साथ संघर्ष नहीं, बल्कि समन्वय ही स्थायी विकास का आधार बन सकता है।उत्तराखंड की वास्तविक जीत तब होगी, जब हर मानसून के साथ आपदा की खबरें नहीं, बल्कि सुरक्षित गांव, निर्बाध सड़कें, मजबूत पुल और भरोसेमंद व्यवस्था की कहानियां सामने आएंगी। यही राज्य के विकास, सुशासन और हिमालय के प्रति हमारी वास्तविक जिम्मेदारी की कसौटी होगी।

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