Thursday, July 25
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परिवार और समाज को नशा अंधकार की और ले जा रहा है- ललित जोशी

हाईकोर्ट एवं सुप्रीम कोर्ट के जजों ने नशे के खिलाफ सीआईएमएस कॉलेज द्वारा प्रस्तुत नुक्कड़ नाटक को सराहा।

देहरादून सीआईएमएस कॉलेज के छात्र छात्राओं ने नशे खिलाफ नुक्कड़ की दी प्रस्तुति। जजों सराहा सीआईएमएस कॉलेज के बच्चों द्वारा नशे के खिलाफ नुक्कड़ नाटक को सुप्रीम कोर्ट की परिवार न्यायालय समिति के निर्देश पर उच्च न्यायालय उत्तराखण्ड द्वारा दो दिवसीय उत्तरीय क्षेत्र सम्मेलन का आयोजन किया गया। सम्मेलन में पारिवारिक न्यायालय को लेकर जागरूकता व युवाओं को नशे के दुष्प्रभाव से जागरूक करने को लेकर मंथन हुआ। इस दौरान बताया गया कि बच्चों को नशे के दुष्प्रभावों बारे में जागरूक करने हेतु नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो के सहयोग से सभी स्कूलों और संस्थानों को मिलाकर एक ड्रग जागरूकता अभियान शुरू किया जाएगा।

सम्मेलन में सीआईएमएस कॉलेज देहरादून के छात्र-छात्राओं द्वारा संस्थान के चेयरमैन एडवोकेट ललित मोहन जोशी के निर्देशन में नशे के ऊपर एक नुक्कड़ नाटक की प्रस्तुति दी जिसमें दिखाया गया कि घर का एक भी सदस्य अगर नशे के आदी हो जाता है, तो वह कैसे पूरे परिवार को प्रभावित कर सकता है। और कैसे एक खुशहाल परिवार बर्बादी की कगार पर पहुंच जाता है। नुक्कड़ में मुख्य किरदार रवि, उकासा, मयंक, अल्का, रिया, प्रियांजली, जतिन, खुशी, अफजाल, नेहा व सौम्या ने निभाया, स्वाति भारद्वाज व लखवीर सहायक की भूमिका में उपस्थित रहे तथा कॉलेज की शिक्षिका शिवानी बिष्ट ने छात्र-छात्राओं को मार्गदर्शित किया। छात्र-छात्राओं की इस प्रस्तुति का कार्यक्रम में उपस्थित प्रदेश के राज्यपाल लेंफ्टिनेंट जनरल (सेवानिवृत्त) गुरमीत सिंह, सुप्रीम कोर्ट व हाईकोर्ट के जजों द्वारा बेहद सराहना की। बता दें कि सीआईएमएस कॉलेज देहरादून के चेयरमैन एडवोकेट ललित मोहन जोशी सजग इंडिया के माध्यम से विगत 15 से अधिक वर्षों से नशे के खिलाफ जगजागरूकता अभियान चला रहे हैं। उनके इस जागरूकता कार्यक्रम की सराहना करते हुए उत्तराखण्ड उच्च न्यायालय ने अपने अभियान में उनसे भी सहयोग की अपील की है। सम्मेलन में बताया गया कि उत्तराखण्ड उच्च न्यायालय की खंडपीठ ने राज्य सरकार को परिवार में दो काउंसलर, एक बाल काउंसलर और एक जनरल काउंसलर नियुक्त करने का निर्देश दिया। चार प्रमुख जिलों देहरादून, हरिद्वार, नैनीताल और ऊधमसिंह नगर की अदालतों में मुकद्मा करने वाले माता-पिता के बच्चों की मानसिक जरूरतों की जांच की जा सकती है, ताकि बच्चों को मानसिक रूप से पीडित न होना पड़े। प्रत्येक पारिवारिक न्यायालय में एक बाल-कक्ष स्थापित करने के भी निर्देश दिए गए हैं, ताकि मुकद्मा करने वाले माता पिता के बच्चों के बच्चों के लिए सकारात्मक माहौल बनाया जा सके। उच्च न्यायालय परिसर में मध्यस्थता और सुलह केन्द्र/ एडीआर केन्द्र में वैवाहिक विवादों, वरिष्ठ नागरिकों के विवादों आदि के मामलों में परामर्श के लिए एक सामान्य परामर्शदाता और टूटे हुए विवाह के बच्चों की परामर्श के लिए एक बाल परामर्शदाता की नियुक्ति की प्रक्रिया चल रही है। बताया गया कि राज्य में मार्च 2022 से मार्च 2024 तक वैवाहिक मामले में सफल काउंसलिंग का प्रतिशत 13.03 है। न्यायालय के समक्ष कानूनी मामलों से निपटने के दौरान मुख्य न्यायाधीश उत्तराखण्ड उच्च न्यायालय के मामलों में परामर्श में तेजी आ रही है।

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